उदी राख होकर भी जीना सिखाती है*

उदी राख होकर भी जीना सिखाती है 


साई जिसे भी शिरडी बुलाते हैं, उसे साई की धूनी की राख, जिसे साई के भक्त उदी कहते हैं, साथ में लेकर आने की ललक रहती है. कतार में खड़े, साई के दीवाने इस उदी को मिलने पर माथे पर लगाते हैं, पानी में घोल कर पी लेते हैं, किसी भी शुभ कार्य में जाने से पहले उसे ज़रूर अपने साथ रखते हैं, काफी सारे तो उसे रोज़ ही सवेरे-शाम अपने माथे लगाकर धन्य महसूस करते हैं. दाभोलकरजी द्वारा रचित पावन ग्रन्थ, श्री साई सच्चरित्र, में उदी के कई सारे चमत्कारों का उल्लेख भी मिलता है.

ये चमत्कार आज भी होते रहते हैं. बाबा की धूनी की उदी आज भी रामबाण औषधि है, संकट हरती है, कल्याण करती है और साई के सदा जीवित होने और उनका अपने भक्तों के साथ सदैव होने का सतत अहसास कराती रहती है. आज भी पूरे के पूरे कई ग्रन्थ इस उदी के चमत्कारों पर लिखे जा सकते हैं.

इतिहास गवाह है कि साई ने अपने दूसरे प्रवास में शिरडी की उस टूटी-फूटी इमारत, जो कि एक ज़माने की मस्जिद थी और कई सालों से इसमें इबादत होना बंद हो चुकी थी, को अपना ठिकाना बना लिया. इसे बाद में बाबा ने मस्जिदमाई कहा और अपने अनगिनत चमत्कारों, कर्मो और अपने जीवन के साथ-साथ समाधि का भी साक्षी बनाया.



इसी जगह को बाद में लोगों ने अपनी योग्यतानुसार और प्रारब्ध के चलते ज्ञान, काम, अर्थ और मोक्ष पाने का साधन मानते हुए द्वारिकामाई कहा. इसी पावन स्थान साई ने एक नित्य अग्निहोत्र के समान धूनी पूरे समय जलाए रखी. बाबा के हाथ से प्रज्ज्वलित यह धूनी आज भी अनवरत जल ही रही है. बाबा भक्तों से जो दक्षिणा लेते, उससे मुख्यतः इस धूनी के लिए लकड़ियाँ मोल लेते. बाबा पूरे समय अपने हाथों से इस धूनी में लकड़ियाँ डालते रहते. यह क्रम बाबा की समाधि के बाद उनके कई भक्तों ने निभाया और अब साई बाबा संस्थान इस धूनी की पवित्र आग को जलाए रख रहा है.

बाबा जब शिरडी में नए-नए आए थे तो उन्होंने लोगों के रोगों का इलाज अपनी अनोखी चिकित्सीय विधा से किया लेकिन जब लोगों की भीड़ शिरडी में बढ़ने लगी तो बाबा ने इसी धूनी से मुट्ठी भर-भर राख लोगों को देना शुरू कर दिया और इस राख ने तो चमत्कार कर दिए. इसी राख ने कितनों को ना जाने नयी ज़िन्दगी दी और कितनों को ही रोग-मुक्त किया. कईयों के बिगड़े काम बने तो कईयों को खोया भाग्य मिला.

कई भक्तों के तो भाल पर बाबा अपने हाथों से उदी लगाते. यहाँ तक कि अपने घोड़े श्यामसुंदर को भी पालकी के लिए चलने के समय प्यार से उदी लगाते. बड़े प्यार से बाबा खुले हाथों से उदी बांटते और गाते..”रमते राम आओजी, उदियाँ की गुनिया लाओ जी..”

शायद बाबा उदी में हमारे जीवन का सार समझते थे और सदैव उनका प्रयत्न ऐसा ही रहता था कि हम सभी जीवन की क्षण-भंगुरता को समझें. यह परम सत्य है कि म्रत्यु सभी को आनी है और इसका कोई भी समय निश्चित नही है. हम सभी को एक ना एक दिन राख में तब्दील हो जाना है. अरबोंपति हो या फ़क़ीर, सभी की राख एक मुट्ठी बराबर ही होती है. फिर काहे का दंभ करते हैं हम सब!? चिता की आग, सभी को एक बराबर समझती है. सभी का अंत वही है. लेकिन जिस तरह उदी राख होने के बावजूद भी उसको माथे पर लगाया जाता है और राख होने पर भी वह कल्याणकारी होती है, ऐसा किरदार हम सभी का क्यों नहीं हो सकता? क्यों हम ऐसा जीवन ना जियें, जिसमे करुणा, प्रेम, आत्मीयता, क्षमा, शांति और एकात्मता का भाव हो जो हमारे जीते जी ऐसी मिसाल बन जाए जिसे हमारे होने पर लोग आदर्श मान कर हमारे जैसे बनने का प्रयास करें और राख होने पर भी हमारा जीवन और उसमे किये कार्य, लोगों का कल्याण करें.

*बाबा की उदी यही भाव सिखाती है..*

*श्री सद्गुरु साईनाथार्पणमस्तु. शुभं भवतु.*

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