कर्म का फल तो भुगतना ही होगा



तुलसीदास जी ने लिखा है;-
प्रारब्ध पहले रचा, पीछे रचा शरीर। तुलसी चिन्ता क्यो करे, भज ले श्रीरघुबीर ।।

एक गुरूजी हमेशा ईश्वर के नाम का जाप किया करते थे। काफी बुजुर्ग हो गये थे। कुछ शिष्य साथ में ही पास के कमरे मे रहते थे। जब भी गुरूजी को शौच; स्नान आदि के लिये जाना होता था; शिष्यो को आवाज लगाते थे और शिष्य ले जाते थे। धीरे-धीरे कुछ दिन बाद शिष्य दो तीन बार आवाज लगाने के बाद भी कभी आते कभी और भी देर से आते।


एक रात को निवृत्त होने के लिये जैसे ही गुरूजी ने आवाज लगाई तुरन्त एक बालक आया और बडे ही कोमल स्पर्श के साथ गुरूजी को निवृत्त करवाकर बिस्तर पर लेटा गया।अब ये रोज का नियम हो गया। एक दिन गुरूजी को शक हुआ कि पहले तो तीन चार बार आवाज पर भी कोई सुनता न था, ये बालक तो आवाज लगाते ही दूसरे क्षण आ जाता है और बडे कोमल स्पर्श से सब निवृत्त करवा देता है।

गुरूजी ने बालक का हाथ पकड लिया और पूछा कि सच-बता तू कौन है? मेरे शिष्य तो ऐसे नही हैं। बालक के रूप में स्वयं ईश्वर थे; उन्होंने वास्तविक रूप में दर्शन दिए। गुरूजी रोने लगे- हे प्रभु! आप स्वयं मेरे निवृति के कार्य कर रहे हैं। यदि इतने प्रसन्न हो तो मुक्ति ही दे दो।

प्रभु ने कहा- जो भुगत रहे हो वह आपके प्रारब्ध है।मेरे सच्चे साधक हो, हमेशा मेरा नाम जपते हो इसलिये मैं आपके प्रारब्ध भी आपकी सच्ची साधना के कारण स्वयं कटवा रहा हूँ।

“क्या मेरे प्रारब्ध आपकी कृपा से भी बडे हैं? क्या आपकी कृपा, मेरे प्रारब्ध नहीं काट सकती है?”

प्रभु कहते हैं- मेरी कृपा सर्वोपरि है। ये अवश्य आपके प्रारब्ध काट सकती है; लेकिन फिर अगले जन्म मे आपको ये प्रारब्ध भुगतने फिर से आना होगा। यही कर्म नियम है। अतः आपके प्रारब्ध अपने हाथों से कटवाकर इस जन्म-मरण से आपको मुक्ति देना चाहता हूँ।

प्रारब्ध तीन तरह के होते हैं; मन्द, तीव्र तथा तीव्रतम।
मन्द प्रारब्ध मेरा नाम जपने से कट जाते है। तीव्र प्रारब्ध किसी सच्चे संत का संग करके श्रद्धा-विश्वास से मेरा नाम जपने पर कट जाते है परन्तु; तीव्रतम प्रारब्ध भुगतने ही पडते हैं। पर जो हर समय विश्वास से मुझे जपते हैं; उनके प्रारब्ध मैं स्वयं साथ रहकर कटवाता हूँ और तीव्रता का अहसास नहीं होने देता।

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